बुधवार, 19 सितंबर 2018

फिजूल के अरमां

ढलती हुई शाम को सहारे चाहिये... 
कुछ गुजरते हुए तूफानों को भी किनारे चाहिये...

सुकूँ से सोये हुए जमाने गुजर गये... 
पास आओ जरा कंधे फिर तुम्हारे चाहिये...

ख्वाबों की ताबीर हो, ये तमन्ना किसे नहीं... 
तुम दिख जाओ कहीं, भला अब और क्या चाहिये...

यूं तो सई-ए-मुसलसल से कट रही हैं उम्र अपनी...
'मेहर' थाम लेती हाथ जो....
   ..... जाने दो ये फिजूल के अरमां नहीं चाहिये... 

रविवार, 18 नवंबर 2012

मेहराब

ऐ 'मेहर' तेरे मेहराब (1) से हम यूँ महरूम रहे...
कदम बढते रहे और हम बे-निशां युहीं चलते रहे... !!!



मेहराब = a wall-sign in the mosque that point towards Kabba in Mecca.

बुधवार, 1 अगस्त 2012

अभी और जीना है ....!


वक़्त कुछ देर और ठेहेर जाता अगर, 
तू धुंधला ही सही, मगर नज़र आता अगर,
वफ़ा की राह पर कुछ कदम और चल पाते शायद,
रोक लिया होता, जब जाने का ज़िक्र किया था तुमने, अगर....

कितना कुछ रह गया था कहने और सुनने को अभी,
आँखों ने कहाँ भर के बातें करी थी अभी,
कुछ जज्बातों के ताले खोलने रह गए थे अभी,
ठेहेर जाते की हम और जीना चाहते थे अभी...

छोड़ रहें हैं तुम्हे और खुद को अब किस्मत के हवाले,
बन जाएँ शायद, या गुमनान फिरें मारे मारे,
दुआ है रब से कुछ ताल-मेल कर दे वो ऐसा,
हर मुश्किल तुम्हारी, हमसे गुज़र कर जाये हमेशा ...


सोमवार, 5 मार्च 2012

हौसला...

रख हौसला के वो मंज़र भी आएगा…
प्यासे के पास चल के कभी तो दरिया आएगा...
थक कर ना बैठ ऐ मंजिल के मुसाफिर...
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा...

मुश्किलें

कभी मुश्किलों से मंजिल मिला करती थी...

अब मुश्किलें ही  मंजिल-ए-'मेहर'...

मेरी जिंदगी...

जिंदगी आ तुझे बाँहों में भर लूँ,
आ तुझे मै थोडा सा जी लूँ...

कुछ कहेंगे बेवफा है तू,
पर सूरत-ए-हाल मे फंसा एक जाल है तू...

कभी ख़्वाबों का समंदर,
कभी रेत में बनता सराब (१) है तू...

मेरी जिंदगी, मेरी हमनफस है तू,
मेरा एहसास, मेरी 'मेहर' है तू...

 सराब (१) = Mirage 

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

अधुरा ख्वाब....!!

 
 
अभी कल रात ही तो मिले थे तुमसे, कुछ नए रिश्तों की आगाज़ भी हुई. |
 
तन्हाई की इस शाम में, कुछ बाहार चाँद की हुई. | 
 
कितना कुछ कहते, कितना कुछ सुनते, मगर नजाने यह सुबह फिर कहाँ से हुई. ||