गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

तेरे सिवा....

तेरे सिवा....


रात काली श्याही सी है...
और दिन में कुछ दिखता नहीं...तेरे सिवा...!


सपने कुछ धूमिल से है...
और खुली पलकें कुछ नम सी हैं... तेरे सिवा...!


हकीकत कुछ नाराज़ सी है...
और अरमानों को कुछ सूजता नहीं... तेरे सिवा...!


दिल में दर्द कम नहीं है...
और इसकी कोई दवा नहीं है... तेरे सिवा...!


तू मेरी हो न सकी है...
और मै किसीका 'ना' होना चाहूँ ... तेरे सिवा...!

Vins :)

9 टिप्‍पणियां:

  1. mast hai mota bhai ;-)...

    दिल में दर्द कम नहीं है...
    और इसकी कोई दवा नहीं है... तेरे सिवा...!

    तू मेरी हो न सकी है...
    और मै किसीका 'ना' होना चाहूँ ... तेरे सिवा...!

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  2. वाह...आपका ये अंदाज़ बहुत दिलकश है...अच्छा लगा...लिखते रहिये...

    नीरज

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  3. कौन लिख पाया ये दास्तां,श्याम,
    आशिके-दर्दे-दिल के सिवा ।

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  4. hey vinish i read this for the first time.....sahi hai, aap to multitalented ho :-)

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