रविवार, 16 अक्तूबर 2011

कमबख्त ये अरमान...!!!

 
कुछ कहे - कुछ अनकहे, हालात से जूझते ये अरमान...
कभी पलकों में सिमटे, मुस्कानों में लिपटे, हर वक़्त कुछ टूटते ये अरमान...
दरीचों में, बगीचों में, शाम-ओ-सुबह में, एक परछाई को दुढ़ते ये अरमान...
मदमस्त हवाओं के इन झोको में, कुछ उलझी जुल्फों को सुलझाने के अरमान...
 
तमन्नाओं का जाल... कमबख्त ये अरमान...!!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...बेजोड़ रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  2. दरीचों में, बगीचों में, शाम-ओ-सुबह में, एक परछाई को दुढ़ते ये अरमान...Kitne sachchy hain yah armaan...

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