गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

पता नहीं!!


इन् पंक्तियों में मैने उस इंसान कि व्यथा दर्शाने का प्रयत्न किया है, जिसने पैसे और स्पर्धा कि कश्मकश में सच्ची खुशियों कि बलि चढा दी और उम्र के आखरी पड़ाव पे वो अकेला बैठा सोच रहा है...

पचपन पतझड़ काट चुके हैं, सावन का पता नहीं!!

जिंदगी के इस मोड़ पर, क्या खोया क्या पाया? पता नहीं!!

जिन निगाहों पे हम मरते... वो कब बंद हुयी? पता नहीं!!

पैसे जोड़े तिल तिल कर, रिश्ते कब तोडे? पता नहीं!!

जिनके लिए दिन-रात लडे... वो बच्चे कहाँ है? पता नहीं!!

सपने वो सारे, सोचा सच होंगे... वो कहाँ सो गये? पता नहीं!!

मेहनत को वो हर एक दिन... मुस्कुराना भूले क्यों? पता नहीं!!

उन हसीं लम्हों को जी सकते थे... उन्हें मारा क्यों? पता नहीं!!

जीवन कि जद्दोजेहेद में, कब जीना छुटा? पता नहीं!!

मित्रों से विनंती है कि व्यर्थ के प्रलोभन को त्याग कर वो करिये जिससे आपको वाकई में सुख मिलता है....!
एक प्रयास, Vins :)

16 टिप्‍पणियां:

  1. पैसे जोड़े तिल तिल कर, रिश्ते कब तोडे? पता नहीं!!

    sir kya kahoon ab main, aapne jis khoobsoorati ke saath aapne jeevan ke utaar chadhaavon ko bayaan kiya hai....

    agar mein kuch bhi kahoonga to tauheen hogi...

    aapne itna khoobsurat likha hai ki shabd nahi rahey mere paas...aisa laga ki jaise main apna bhavishyaa dekh raha hoon....

    jhakjhor dene wali rachna ko prastut karne ke liye haardik aabhaar!!

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  2. इस कविता में ज़िन्दगी की सचाई है . बहुत ही सुन्दर रचना है.

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  3. Well said Sirji.
    Waiting for many more like this.
    All the best. :)

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  4. जिन्हें इन बातों का पहले से ही पता रहता है वो इस उम्र में भी मस्ती करते हैं...बहुत अच्छी रचना है आपकी...बधाई.
    नीरज

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  5. बहुत अच्छी लगी ये कविता । भौतिकता के पीछे भागते हुए कब जीवन छूट जाता है , पता ही नहीं चलता।

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  6. bhtrin andaaz men btrin jzbaat kaa ankn he mubark ho lekin aek din sb pta achl jayegaa ghbraane ki zrurt nhin he . akhtar khan akela kota rtajsthan

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  7. यथार्थवादी कविता जीवन दर्शन करा गयी।

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  8. पैसे जोड़े तिल तिल कर, रिश्ते कब तोडे? पता नहीं!!

    bahut hi khoobsoorat...

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  9. Aah! Kya kahun??Aisa bahut dekha...khud apne pariwarme bhee!
    Rachana bahut achhee ban padee hai!

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