सोमवार, 15 नवंबर 2010

मुफलिसी का दौर छाया है...!

आज कल मुफलिसी का दौर छाया है.
की ख्वाब भी आने की कीमत मांगते हैं...

खर्चने को अब ना कुछ बाकि रहा है,
की रिश्ते भी किश्तों में जीए जा रहें हैं...

रुपये पैसे से ही जीवन का अब मोल है,
की जज़्बात जैसे मुफ्त में बट रहें हैं...

काश हम लौट चलें उस दौर में...
जहाँ अपनों का अपनापन हमारी दौलत थी...

8 टिप्‍पणियां:

  1. kya baat hai!
    puuraani yaadein taaza karna koi aap se seekhe...
    muflisi ko itni khoobsurati se bayaan shaayad aaj tak kisi ne na kiya hoga!

    carry on!

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  2. बहुत शशक्त रचना है आपकी...जीवन की सच्चाइयों को बहुत खूबी से बयां किया है...
    मेरी गज़ल आपके काम आई...और क्या चाहिए...समझिए लेखन सफल हुआ...शुक्रिया.

    नीरज

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  3. हम तो बस मुफ़लिसी मॅ जिए जा रहे है ...

    बहुत खूब जनाब

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  4. very touchy lines...where have you been hiding this talent till now?

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  5. satya hai आज कल मुफलिसी का दौर छाया है...

    Gareeb ke dil ki awaaz aaptak pahunch hi gayee...

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  6. bohot bohot dhanyawaad iss abhinandan key liye...

    Aapka Mitr...
    Vins :)

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